Janjatiya Gaurav Divas,जनजातीय गौरव दिवस का इतिहास और महत्व जाने विस्तार से

safalta expert Published by: Chanchal Singh Updated Mon, 14 Nov 2022 04:28 PM IST

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देशभर में शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सभी स्कूलों के साथ-साथ उच्च शिक्षण संस्थानों में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाएगा।

Janjatiya Gaurav Divas : देश में आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति एवं विरासत, धरोहर और उनके द्वारा दिए गए राष्ट्र निर्माण में योगदान को याद करने के लिए पिछले साल 2021 में केंद्र सरकार ने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जन्म जयंती को देश में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में नामित किया था। पिछले साल देशभर में 15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर जनजातीय गौरव दिवस मनाया गया, अब इसी सिलसिले को जारी रखते हुए केंद्र सरकार हर साल जनजातीय गौरव दिवस मनाता है। इस साल देश में दूसरी बार जनजातीय गौरव दिवस 15 नवंबर को मनाया जाएगा। झारखंड के मुंडा जनजाति से ताल्लुक रखने वाले भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को हुआ था। 19वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश शासन के दौरान आदिवासी बेल्ट के बंगाल प्रेसिडेंसी (वर्तमान में झारखंड) में आदिवासी आंदोलन का नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया था।

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Source: safalta

इनकी जयंती के अवसर पर बिरसा मुंडा जयंती मनाई जाती है, जिसे पिछले साल सरकार ने बिरसा मुंडा नाम को बदलकर जनजातीय गौरव दिवस रखा था। पूरे झारखंड में धरती आबा के नाम से जाने जाने वाले बिरसा मुंडा के जन्मदिन के अवसर पर झारखंड की स्थापना दिवस भी मनाया जाता है। झारखंड साल 2000 में बिहार से अलग होकर एक नया राज्य बना था।  अगर आप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और विशेषज्ञ मार्गदर्शन की तलाश कर रहे हैं, तो आप हमारे जनरल अवेयरनेस ई बुक डाउनलोड कर सकते हैं   FREE GK EBook- Download Now. / GK Capsule Free pdf - Download here
 

 शिक्षा मंत्रालय में मनाया जाएगा जनजातीय गौरव दिवस 


देशभर में शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सभी स्कूलों के साथ-साथ उच्च शिक्षण संस्थानों में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाएगा। इस समारोह के दौरान बिरसा मुंडा एवं उनके जैसे और अन्य वीर आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर, उनके योगदान पर प्रकाश डाला जाएगा। शिक्षा मंत्रालय आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को उल्लेख करने के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय और निजी विश्वविद्यालय, अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थान, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और केंद्रीय विद्यालय के सहयोग से शिक्षा मंत्रालय पूरे देश भर के शैक्षणिक संस्थान में जनजातीय गौरव दिवस मनाएंगे। आदिवासी सेनानी जो देश के लिए जान की बाजी लगा दी, आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के नाम में सबसे पहले भगवान बिरसा मुंडा का नाम आता है। बिरसा मुंडा के अलावा और भी ऐसे गुमनाम आदिवासी स्वतंत्रता नायक हुए हैं जिन्होंने भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दी है आइए जानते हैं इनके बारे में-


आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी के बारे में 


शहीद वीर नारायण सिंह 


शहीद वीर नारायण सिंह छत्तीसगढ़ में सोनाखान के गौरव माने जाते हैं, कहा जाता है कि उन्होंने साल 1856  के अकाल बाद व्यापारियों के अनाज के स्टॉक को लूट लिया और गरीबों में बांटा था। नारायण सिंह के बलिदान ने उन्हें आदिवासी नेता बनाया और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ राज्य के पहले शहीद बने। सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इस ऐप से करें फ्री में प्रिपरेशन - Safalta Application
 

 श्री अल्लूरी सीताराम राजू 


आंध्र प्रदेश में भीमावरम के पास मोगल्लु नामक छोटे से गांव में श्री अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 4 जुलाई 1897 को हुआ था, इन्होंने आदिवासी के अधिकारों के लिए जीवन भर लड़ाई लड़ी, अल्लूरी को अंग्रेजो के खिलाफ रंपा विद्रोह के नेतृत्व के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। इन्होंने विशाखापत्तनम और पूर्वी गोदावरी जिलों के आदिवासी लोगों को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए संगठित किया था। अल्लूरी सीताराम राजू को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा बंगाल के क्रांतिकारियों से मिली थी।  Free Daily Current Affair Quiz-Attempt Now with exciting prize


 रानी गोंडिल्यू 


 रानी गोंडिल्यू नगा समुदाय की आध्यात्मिक एवं राजनीतिक नेता थी। इन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया है। 13 साल की उम्र में यह अपने चचेरे भाई हाइपौ जादोनांग के हेराका धार्मिक आंदोलन में शामिल हुई थी। उनके नगा लिए लोगों की स्वतंत्रता की यात्रा स्वतंत्रता के लिए व्यापक आंदोलन का हिस्सा थी। मणिपुर क्षेत्र में महात्मा गांधी के संदेशों का प्रचार-प्रसार भी इन्होंने किया है।


 सिद्धू और कान्हू मुर्मू 


  1857 के विद्रोह से 2 साल पहले संथाल भाइयों सिद्धू कान्हू मुर्मू ने 10,000 संथालों को इकट्ठा कर अंग्रेज के खिलाफ विद्रोह की घोषणा की थी। आदिवासियों ने अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से भगाने के लिए शपथ ली। मुर्मू भाइयों की बहनों फूलों और झानो ने भी इस विद्रोह में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, झारखंड राज्य में स्वतंत्रता इन दोनों स्वतंत्रता सेनानियों की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है।

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